भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूजनीय देवता माना गया है। हर शुभ कार्य से पहले गणपति की आराधना की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। गणेश जी की प्रतिमा, तस्वीर और उनके स्वरूप से जुड़े कई गूढ़ अर्थ हैं, जो हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, बुद्धि, कार्यसिद्धि और समृद्धि का संचार करते हैं। इसलिए गणपति की स्थापना से पहले वास्तु और ज्योतिष में बताए गए नियमों को जानना बेहद आवश्यक है।
गणेश जी की प्रतिमा में हर अंग का विशेष महत्व होता है। भगवा या लाल रंग नई ऊर्जा का प्रतीक है, जो व्यक्ति को उत्साह और सकारात्मक सोच प्रदान करता है। उनका एक दंत दक्षता और एकाग्रता का संदेश देता है। बड़ा सिर व्यापक सोच को विकसित करता है, बड़े कान अधिक ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता का प्रतीक हैं। लम्बी सूंड दूरदर्शिता और विवेक का प्रतीक है। चार भुजाएं कार्य के चार सूत्रों–धैर्य, परिश्रम, ज्ञान और समर्पण–को दर्शाती हैं। इनके हाथ में पाश मन की चंचलता को बांधने का संदेश देता है, अंकुश समय सीमा में काम पूरा करने की प्रेरणा देता है। वरमुद्रा आत्मविश्वास और आशीर्वाद का प्रतीक है, जबकि बड़ा पेट विचारों को सहन और पचाने की क्षमता को दर्शाता है। मूषक चंचल मन को स्थिर करने तथा मोदक सात्विकता का संदेश देते हैं।
वास्तु के अनुसार गणेश जी की प्रतिमा घर के मुख्य द्वार पर नहीं लगानी चाहिए। बहुत से लोग गलती से प्रवेश द्वार पर गणपति की प्रतिमा इस प्रकार लगा देते हैं कि उनकी पीठ अंदर या बाहर की ओर हो जाती है। इससे घर में नकारात्मकता और आर्थिक समस्या बढ़ने की आशंका रहती है। घर में केवल एक ही प्रतिमा होनी चाहिए, ताकि श्रद्धा एकाग्र रहे। प्रतिमा हमेशा पूर्व दिशा या ईशान कोण में स्थापित करना शुभ माना जाता है।
प्रतिमा का आकार भी वास्तु में महत्वपूर्ण है। घर के भीतर 1.5 इंच से 12 इंच तक की प्रतिमा को शुभ माना गया है। उससे बड़ी प्रतिमा को घर के बाहर मंदिर या झांकी में स्थापित करना उचित है। स्थापना के समय लाल या पीले वस्त्र पर प्रतिमा बैठाएं, गंगाजल से स्थान शुद्ध करें और पंचामृत स्नान कराएं। चंदन, कुमकुम, फूल, हरी दूर्वा, धूप–दीप और नैवेद्य अर्पित कर गणपति का पूजन करें। गणेश जी के दाहिनी ओर कलश स्थापित करना शुभता का प्रतीक है। तेल का दीपक बाईं ओर और घी का दीपक दाईं ओर रखना पूजा की ऊर्जा को संतुलित करता है।